Saturday, August 12, 2017

गोरखपुर का सच



जापानी बुखार ने पुरे जापान में उतनी जिन्दगिया नहीं निगली होंगी जितनी कि अकेले गोरखपुर और उसके आस पास के इलाके में. आलम तो ये है कि मेडिकल के परीक्षा में "गोरखपुर" शब्द देखते ही छात्र  JE का आप्शन खोजने  लगते हैं. पिछले साल ही AIIMS के एग्जाम में गोरखपुर नाम से 5 सवाल पूछे गए थे जिनका  जवाब japanese encephalitis या उनसे जुड़ा कोई तथ्य था. कमोबेश ये ऐसा ही है जैसा कि US MLE के एग्जाम में लोग इंडिया देखते ही TB और अफ्रीका देखते ही एड्स के बारे में सोचने लगते हैं.


अब आते हैं गोरखपुर कांड पे. अचानक ऑक्सीजन बंद हो जाने से 60 के करीब बच्चे मारे गए, या यूँ कहें कि इनकी निर्मम हत्या हो गयी. बेचारे तो महसूस भी नहीं कर पाए होंगे मौत के कष्ट को. (दिमाग बुरी तरह प्रभावित होने पे बेहोशी की हालत रहती है.) 

मगर परिज़न,माँ बाप? जो चले गए वे तो चले गए. मगर जिनको छोड़ के गए वो? क्या आजीवन वे अपनी गरीबी, महंगे अस्पताल का भार नहीं उठा पाने की मजबूरी, या सरकार या सरकारी अस्पताल पे किये गए जरुरत से ज्यादा भरोसे का फल - इन सब के मिले जुले जघन्य अपराधबोध से कभी मुक्त हो पाएंगे? क्या वे दुबारा कभी भी सरकारी अस्पताल का रुख कर पाएंगे? और इस खबर से और कितने लोग प्रभावित होंगे? और फिर मामूली सी बिमारी के लिए भी ये लोग किसी कॉर्पोरेट हॉस्पिटल के बिल चुकाने के लिए अपनी जमीन-जायदाद गिरवी रखते पाए जायेंगे? और फिर इस न्यूज़ को निजी अस्पताल वाले अपने advertisement के लिए बेशर्मी से use करते पाए जायेंगे? और फिर मीडिया? क्या बिना घातक परिणाम की परवाह किये, सनसनी के एक मात्र लक्ष्य की प्राप्ति में लगी रहेगी?

तो गलती किसकी थी? 
इन मासूम बच्चो की तो बिलकुल नहीं. 
और जैसे कि हर मौत के लिए किसी डॉक्टर को जिम्मेदार ठहरा दिया जाता है, तो यहाँ भी सारा दोष उन्ही डॉक्टरों के माथे लादा जाए, उन्हें पिटा जाए, कॉलर पकड़ा जाए और उन्हें सस्पेंड किया जाए? फिर उनसे कहा जाए कि ये खूब कमाते हैं पैसे, क्यों नहीं लाये ये ऑक्सीजन? हैवान हो गए हैं, शैतान हो गए हैं सारे के सारे डॉक्टर. मौत का तमाशा देखते रहे, कुछ नहीं कर पाए ये जालिम डॉक्टर? 
योगी आदित्यनाथ ने कहा था डॉक्टरों से- आप पैसे ना कमायें, दुआ कमाएं. तो डॉक्टर ने ऑक्सीजन की कंपनी को 2-३ हज़ार दुआओं का चेक भेजा. मगर उसे तो साहब ने दुआ नहीं सिर्फ नोट कमाने को कहा था. तब बेचारे डॉक्टर ने मरीजों को भी दुआ देना शुरू कर दिया दवा के साथ साथ. मगर यमराज पे भी दुआओं का कोई असर नहीं. अब क्या करते? 

तो क्या गलती योगी आदित्यनाथ की है? उनके क्षेत्र की बात है. लगातार विजिट करते थे वहां फिर कैसे?

जो लोग नहीं जानते कुछ ज्यादा इस मर्ज़ के बारे में उन्हें बता दें कि ये बीमारी मच्छर के काटने से होता है, जिससे JE का वायरस दिमाग में घुस जाता है और तबाही मचाता है. इतना खतरनाक कि एक तिहाई लोग सीधे मौत के मुंह में चले जाते हैं और एक तिहाई आजीवन विकलांग रह जाते हैं. इलाज़ के नाम पे अभी भी मेडिकल साइंस के पास कुछ भी नहीं है सिवाय बुखार कम करने के, मिर्गी का दौरा पड़ने पे उसे नियंत्रित करने के और समय पड़ने पर असीमित समय के लिए वेंटीलेटर पर डाल कर परिज़नो को सांत्वना देने के. हाँ इस बिमारी के रोक थाम के पुखते उपाय जरुर हैं जिनमे सबसे कारगर है मच्छरो का नाश और वैक्सीन यानि टीकाकरण.

आइये मूल समस्या की बात करते हैं. ये सिर्फ गोरखपुर नहीं पुरे देश के हर सरकारी मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल की स्थिति है.

स्वास्थ्य मंत्री- अधिकतर मंत्रियों को तो मर्ज़-इलाज़ की abcd भी नहीं आती फिर भी   जनता के जीवन-मौत के मालिक. इन्हें सिर्फ वैसी बातें मीडिया के सामने बोलना आता है जो जनता को सुनने में अच्छी लगे, भले उसके तकनिकी परिणाम कुछ भी हों. सस्ती लोकप्रियता और महंगा कमीशन की औकात वालों को मौत पर भी  घिनौनी राजनीति का खेल खेलने आता है. मुआवजे की रकम का बंदरबांट शुरू होते ही भिखारिन जनता अपने मूल समस्या से कैसे भटकती है ये अच्छी तरह जानते हैं. और फिर बयान आता है लोग तो मरते रहते हैं! हाँ भाई इनका कोई परिजन नहीं न मरा? और मरेगा भी कैसे ? वो तो विदेशों में इलाज़ कराता है? ये खुद कभी उस हॉस्पिटल में भरती नहीं होते सिवाय कि जेल में अचानक से  उठने वाले क्षद्म सीनेके दर्द के आयोजन पे .

हेल्थ सेक्रेटरी/स्वास्थ्य सचिव- इनका काम है हॉस्पिटल में किस कंपनी का जांच घर खुलवाना है, किसे डायरेक्टर बनाना है, किसका प्रोमोशन कराना है , किसका ट्रान्सफर करना है और किस जगह नयी बिल्डिंग बनवाना है, और इन सब में कितना कमाना है. किस कम्पनी के सामान के लिए कितना बकाया है, उसे कब चुकाना है, कितना मोल भाव करना है, नयी  खरीदारी कब करनी है, पुराने के मेंटेनेंस को कितना नज़रंदाज़ करना है इन सब का लेखा जोखा यहाँ होता है. मगर मजाल की कोई आंच आये इनके शाख पे. 

मेडिकल superintendent/ डायरेक्टर- सबसे जघन्य अपराधी. इसीलिए क्योंकि ये डॉक्टर होते हुए भी डॉक्टर जैसा कोई काम नहीं करते. इन्हें सब समझ आता है, कहाँ ऑक्सीजन नहीं है, कहा लिफ्ट ख़राब है, कहा दवाई कम है, किस सामान की खपत ज्यादा है और पूर्ति कम, किस जगह नर्सों की ज्यादा जरुरत है, कहा ट्राली मैन चाहिए और कहाँ ऑपरेशन थिएटर में बिजली-पानी-उपकरण की जरुरत है इन सब तकनिकी चीजों का ज्ञान इन्हें ही होता है, और इसीलिए ये इस पद पर बैठाए भी जाते हैं. मगर नेता-अफसर के तलवे चाटते चाटते ये इतने गिर जाते हैं कि ये भूल ही जाते हैं कि कभी ये भी डॉक्टर हुआ करते थे-जिसकी एक ही प्राथमिकता होती है- मरीज़ की भलाई.! अब तो कमिसन और परमिसन के चक्कर में ये हर चीज़ बेच देते हैं-अपना ईमान, हॉस्पिटल का सामान और फिर मरीजों की जान.

 मीडिया- लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ. जनता के अधिकारों का रक्षक. ये थे कभी ऐसे, पर अब शायद नहीं रहे. एक तरफ जहाँ सरकारी अस्पताल की छोटी से छोटी महत्वहीन गड़बड़ी को छाप कर डॉक्टर-नर्स की बेईज्ज़ती करने में जरा सा भी पीछे नहीं हटते, वही कॉर्पोरेट की बड़ी धाधली वाली खबर भी ये पैसे से निपटा लेते हैं. और मंत्रीजी के आगे पीछे भी तो घूमना है इनको. हाँ भाई विज्ञापन का भी तो सवाल है. और फिर निदेशक/सिविल सर्जन से मिल कर इन्हें जाली सर्टिफिकेट भी तो बनवाना होता है. दरअसल हर कोई सॉफ्ट टारगेट ढूंढता है-यानि ऐसा निशाना जिसपे वार करे तो वाहवाही भी मिले और वो पलट कर वार भी न करे. बेशर्मी की पराकाष्ठा पर जा पहुंचे इन अर्ध-इंसानों से कौन हिसाब मांगे?

कंपनी के मालिक- ये कब से दया करने लगे? और इनसे दया की उम्मीद भी किसे है? भाई! कम्पनी- यानी व्यवसाय -यानी पूंजी -यानी पैसा -यानि कोई भावना-ममता-दया नहीं. हाँ भई! अस्पताल कोई व्यवसाय थोड़े है, उसमे पैसों का क्या काम-वो तो सिर्फ दया दुआ पे चल जाए, मगर इन कंपनी का क्या करेंगे? इन्हें दुआ नहीं सिर्फ पैसा चाहिए. अरे भाई क्या ऑक्सीजन जेनेरिक ब्रांड की नहीं आती?

जनता-जनार्दन: सरकारी सम्पति पे आपका अधिकार है. तो इसकी सुरक्षा आपका ही दायित्व है. सरकार आप खुद बनाते है, कोई दुसरे मुल्क से नहीं आता. जब भी आप सरकारी अस्पताल में होते हैं तो हर जगह थूकने-मुतने की प्रक्रिया आप जितने अधिकार से करते हैं, अनावश्यक पंखे-बल्ब का बेदर्दी से शोषण जो करते हैं, स्विच बोर्ड पे उंगलिया जिस कदर पटकते हैं और यंत्रों -संयत्रों का दोहन-विसर्जन भी जिस तरह करवाते हैं और जूता पहन के ही icu में प्रवेश का जो रॉब दिखाते हैं न- ये सब कहीं न कहीं ऐसे वारदातों को जन्म देने की वजह बन जाता है. जैसे बात बात पे डॉक्टर की कॉलर खिंच ले जाते हैं आप, और अगले ही पल मंत्री के PA को फोन लगा नर्स से बात करवाते हैं न आप, सबसे पहले आपका ही मरीज़ देखा जाए ,और सिर्फ उसे ही VIP सेवा मिले इस सार्वजानिक अस्पताल में भी -ऐसी व्यवस्था चाहते हैं ,और इसके लिए कभी गुंडे तो कभी लोकल नेताजी को पकड़ पकड़ के लाते हैं न आप- ये सब घृणित उपाय आगे चल कर ऐसी दुर्घटनाओं के कारण बन जाते हैं. जितनी सजगता से डॉक्टर की कमाई नापते हैं न आप अगर उतनी ही जागृति और तत्परता से सरकारी संस्थानों की छोटी मोटी खामियों को दूर करवाने के लिए लग जाते ना आप-तो अधिकार और कर्तव्य के असमंजस से निकल कर ऐसी दुर्घटनाओं को रोक सकने वाले महानायक कहलाते आप.

खैर मैं क्यों लिखू ये सब, मैं भी तो एक आम नागरिक हूँ जो ट्रेन-अस्पताल-डाकघर-स्टेडियम-स्कूल की गन्दी दीवारों पे थूकने-खुरचने या अपना नाम लिख कर कुछ क्षणों के लिए अमर हो जाने के ख्वाब में डूबा रहता हूँ. 

काश कि वे बच्चे ना मरते! काश ऑक्सीजन की उन्हें जरुरत ही न पड़ती! काश कि उन्हें मच्छर ही ना काटते! काश कि उन्हें जापानी बुखार का टिका लग जाता पहले ही! काश कि वे गोरखपुर में नहीं पैदा होते! काश कि वे गरीब घर में नहीं पैदा होते! काश कि वे भारत में नहीं पैदा होते! काश कि 60 बच्चे एक साथ नहीं मरते- रोज़ एक दो कर के मरते-जैसा कि बाकी जगहों पर रोज़ मरते हैं!


1 comment:

  1. dear Doctor
    u seem2b a know all
    except d Medical suprintendent, u r unable to find faults with Medical fraternity.
    what about d likes of Dr. Kafeel Khan, who used d hospital equipment to further his personal private practice
    when JE is so old&big, did someone find a treatment?
    why? whose fault?
    u want some peon2find a cure for JE?
    what about d senior doctors who do private practice while leaving d hospital to d resident doctors?
    doctors pay huge sums to get MBBS&MD/MS and then try to earn d Crores (INR) back?

    we all contribute towards corrupting our own system
    why should a Govt Doctor do private practice, when he gets salary for his/her survival?

    plz stop finding faults with others.
    u r not d repository of all wisdom

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