Monday, May 21, 2018

मौसम

मई की तपिश में ये हसीन बारिश.
सलाखें तोड़ती आवारगी की ख्वाहिश.

ताज़ा अजनबी दर्द मुस्कान में लिपट रहा.
फुर्सत भी नमी ओढ़े मुझ में सिमट रहा.

आशिकी के बादल बरसने को बेताब हैं .
मगर माशूका कौन? ये किसका शबाब है?

आह!
ये तन्हाई में खुद से इश्क करने का मौसम है.
खुद में डूबने - तैरने - भटकने का मौसम है.

© गोविंद माधव

सिलेट पेंसिल


एक दौर था वो जब पलामू के गाँव मे सारे बच्चे सरकारी स्कूलों में ही पढ़ते थे. प्राइवेट स्कूल का कल्चर नहीं आया था. अंग्रेज़ी मीडियम का भूत भी नहीं सवार हुआ था किसी गार्जियन पर. सब बच्चे अपना अपना बोरा और बोरा का ही बना हुआ बस्ता ले कर स्कूल जाते थे.

ओह! क्या दिन थे वे. मासूमियत से लबरेज हम बच्चे. सब के बस्ते में सीलेट और चौक या चुना वाला पेंसिल. ककहारा मात्रा और गिनती लिखना सीखते थे और तुरंत थूक लगा के मिटाते भी थे.

'अरे. विद्या में जूठा करेगा? सरस्वती माता गोसा जाएगी. प्रणाम करो.'

किसी को कलम कागज से लिखते देखते तो मन ललचा जाता था. कब हम भी कॉपी मे लिखेंगे. मगर सिलेट में लिखते हुए हज़ारों गलतियाँ करने की आजादी थी. पेंसिल और कट-पेंसिल अलग अलग चीज़ थी. कटर से छीलने वाला कट-पेंसिल और चौक वाला सिर्फ पेंसिल. रँग बिरंगा लिखने वाला पेंसिल.

बचपन खत्म हुआ तो कलम मिल गया, छूट गया सिलेट. मगर अब हर कदम संभल कर रखना था, हर अक्षर सोच कर लिखना था. क्योंकि अब गलतियाँ मिटती नहीं, हमेशा के लिए दाग बन कर रह जाती हैं.

किसी के पास मिट्टी वाला सिलेट तो किसी के पास प्लास्टिक वाला होता था. प्लास्टिक वाला टूटता नहीं था, लेकिन घिस कर उजर हो जाता था, जिसमें चौक नहीं उगता था. लेकिन प्लास्टिक वाले में रबर गोली से abacus बना रहता था, उसका यूज़ करना तो नहीं आता था हमें पर खेलना जरूर आता था उससे.

तब चंदा मामा हुआ करते थे- दूर के,
पुआ पकाए गुड़ के
अपने खाए थाली में
हमको देते प्याली में
प्याली जाती टूट
हम भी जाते रूठ.

सूरज और झोपड़ी - चित्रकला के नाम पर बस यही बना पाते थे.

और 4 बजते ही लाइन में लगकर समवेत स्वरों में मासूम कंठ गा उठते - "एक पर एक ग्यारह, एक पर दो बारह,... दो पर सोना बीस. मास्टर जी का फीस. टीस टीस टीस..."

अब तो बच्चे कॉपी कलम से आगे निकल टैब्लेट मोबाइल तक पहुंच गए हैं. पता नहीं अब किसी स्कूल मे सिलेट प्रयोग में आता भी है कि नहीं.

क्या अब के बच्चे भी चॉक खाते हैं?
क्या अब भी बच्चे दूसरे की पेंसिल चोरी कर विद्या कसम खाते हैं?
क्या अब भी बच्चे शनिवार को सांस्कृतिक कार्यक्रम में शामिल होकर गाना गाते हैं?
क्या अब भी मिडिल क्लास के बच्चे सरकारी स्कूल में जाते हैं?
क्या अब भी सरकारी स्कूल में मास्टर साहेब ओतना ही दुलार से हाथ पकड़ कर अ.. आ.. लिखना सिखाते हैं....

काश कि फिर से उसी दौर में पहुंच जाते हम जब हाथ में सिलेट होती और होती गलती और मनमानी करने की आजादी. ना होता इतनी समझदारी और किताबों का बोझ, ना ही सम्हल सम्हल कदम रखने की जरूरत.

© Govind Madhaw

#ठेठ_पलामू