Tuesday, August 22, 2017

ल प्रे क 04 : गाज़र का हलवा



"आंटी! पक्का मिल्क उतना ही मिलाना है न? ...थैंक यू"
"दो सालों में आजतक हमें तो कुछ नहीं खिलाया, उलटे ऑमलेट तक हम से बनवाती थी. " रूममेट डॉली नोट्स बनाते हुए बुदबुदाई.
"चुप कर चुड़ैल! अपनी नज़र मत लगा. ख़राब हुआ ना तो तेरे उस गिटारिस्ट को कह दूंगी कि तेरी एंजेल को भोजपुरी गाने पसंद हैं..." टिफ़िन खंगाल अपने दुपट्टे की नोक से पोछते हुए उसने धमकी का छोंका लगा दिया.
“अच्छा तो बनेगा ना? उसे ठीक नहीं लगा तो? मैं कह दूंगी कि जैसा भी हो तारीफ ही करना. लेकिन ये तो खाने की चीज़ है, मेरा चेहरा थोड़े है कि झूठी तारीफ कर पायेगा? जैसे ही मुंह में रखेगा चेहरे के भाव बता देंगे असलियत. देखूंगी ही नहीं मैं उसकी तरफ. और 7 बजे तो गर्ल्स हॉस्टल के पास वैसे भी अँधेरा हो जाता है, दिखेगा ही नहीं उसका चेहरा. लेकिन उसे तो पता है न कि मुझे मैगी के अलावा कुछ भी बनाना नहीं आता! कम से कम मेरे एफोर्ट्स की तो तारीफ करेगा ना? कह दूंगी कि सच बता दे, मुझे बिलकुल बुरा नहीं लगेगा....” अपनी कॉपी का आखिरी पेज फाड़ा, जिसपे ढेर सारे फेक सिग्नेचर और love टेस्ट किये हुए थे. टिफ़िन को अच्छी तरह लपेट कर पॉलि-बैग में रखा. एक चम्मच उसने इस बैग में रखा और एक चम्मच अपनी जेब में छुपाकर.
“अगर वो आया ही नहीं तो? कुछ काम पड़ गया उसे तो? मेरा सरप्राइज का प्लान? और फिर ये डॉली- बहुत मजाक उड़ाएगी मेरा! मैं फेंक दूंगी उधर ही, या अकेले बैठ के खा लुंगी. अगर देर से आया तो? ख़राब तो नहीं न हो जाएगा टेस्ट? उसकी किस्मत, मैं क्यों मरुँ ये सोच सोच कर.” हड़बड़ी में पानी का बोतल छोड़ वह हॉस्टल-गेट की तरफ भागी. पहली बार वो टाइम से पहले पहुँचने वाली थी.
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ल. प्रे. क 03: good morning


मेरी आदतों पर भी कब्जा जमाने लगे हो अब तो तुम. तुम्हारी तरह मैं भी अब मैगी मे सूप का पाउडर मिलाने लगी हूं और तेरे favorite सांग के solo guitar वाले sequence को ध्यान से सुनने लगी हूँ ताकि अगली बार जब तुम फोन पर guitar बजा के सुनाओ तो मैं honestly तारीफ कर सकूं. और इसी तरह सुबह सुबह तुम्हारे गुड मॉर्निंग मैसेज की लत लग गयी है मुझे. अलार्म लगा कर उठते होगे ना तुम मुझे रोज़ जगाने के लिए! I know कि मुझे उठा कर तुम फिर से सो जाते हो. मगर फिर भी दिन की शुरुआत अपने साथ कराने के लिए, रोज़ अलग अलग ढंग से गुड मॉर्निंग कहने के तरीके कहाँ से लाते हो? U know तुम्हारे message के ठीक 2 मिनट पहले मेरी नींद खुल जाती है मगर मैं उठती नहीं बस खुली पलकों से उस रिंगटोन का इंतज़ार करती हूं. पर आज पूरे 14 मिनट ज्यादा हो गए, कहाँ रह गये तुम? कहीं interest तो कम नही हो रहा तुम्हारा? आज जल्दी उठना था मुझे तुम्हें बताया था ना मैंने? लापरवाह होने लगे हो तुम! तबीयत तो खराब नहीं हो गयी तुम्हारी? मैं खुद से कॉल कर लूं क्या, लेकिन मैं तेरा रिकॉर्ड नहीं तोड़ना चाहती. जाओ नहीं चाहिए तुम्हारा कोई message, उसके बिना भी मेरा दिन अच्छा ही जाएगा. जाएगा ना? बोलो ना? बहुत बदल गये हो तुम अब......
"good morning to the prettiest girl on earth... " रिंगटोन बजा.
और नींद के बचे खुचे हिस्से के साथ उसके माथे से चिंता की लकीरें गायब हो गयी थी और लबों से खुशनुमा एहसास सुबह की किरण के साथ बिखरने लगे थे.


ल. प्रे. क. 02: favourite



जब भी मैं तुम्हें कहती हूँ कि वो वाला song मेरा favourite है, तो तुम्हें क्या लगता है कि मैं बस बात करते करते कुछ भी बोल रही हूँ? या फिर कहीं ऐसा तो नहीं ना सोचते तुम, कि ऐसे बस एक और टॉपिक छेड़ देती हूँ मैं, बातचीत जारी रख सकने के लिए, जब भी हम दोनों एक साथ बोल पड़ते हैं - 'और बताओ'!
नहीं नहीं यार! तुम सुनते हो मेरे favourite song को, i know. ख़ास तौर पर जब तुम अपने दोस्तों के बीच होते हो और कही से मेरा वाला गाना बज जाये तो तुम्हें मेरा खयाल जरूर आता है, ये भी अच्छी तरह से जानती हूँ मैं. मगर मैं बस पूछ रही थी कि क्या तुमने कभी सोचा है कि वही song मेरा favourite क्यों है? या मेरे सैकड़ों favourite में से वही क्यो बताया गया है तुम्हें? क्या तुम भी रुकते हो सुनते सुनते उसी लाइन पर जिस पर मैं रुक जाती हूँ? जानते हो, सिर्फ उसी दो लाइंस के लिए मैं पूरे सांग को बार बार सुनती हूं! हाँ मुझे पता है कि जब तक मैं बताऊँ ना, कोई नहीं जान पाएगा कि मुझे किस लाइन पर ठहरने और खुद से रिलेट करने का सुख प्राप्त होता है. मेरी बेवकूफी पर हंसना मत. मगर सच में मैं तुमसे ये expect करती हूँ कि तुम बिन बताए समझ जाओ मेरे लिए किसी भी चीज़ के favourite होने के मायने! काश!

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Ⓒ Govind Madhaw

ल.प्रे.क.01: मैसेज


अब कभी मैसेज नहीं करूंगी उसको.
नही नहीं! तब तक नहीं करूंगी जब तक वो तरस नहीं जाता मेरे मैसेज के लिए. हाँ! 
आज तो बिल्कुल भी नहीं करूंगी.
बहुत attitude है न उसमे! समझ के क्या रखा है खुद को उसने? वो reply नहीं करेगा तो मत करे. मैं कौन सा जो उसके इंतज़ार में मरी जा रही हूँ? Ignore करना मुझे भी आता है. आज दिन भर इनबॉक्स ही नहीं देखूंगी, भले जवाब के इंतज़ार में तड़पता रहेगा आज.
ऐसा सोचते सोचते भर में वह ना जाने कितनी बार उसे "हैलो! कहाँ हो तुम! मिसिंग यू!" वाले मैसेज भेज चुकी थी!


Monday, May 29, 2017

लुप्तप्राय गधों की मीटिंग



गधों ने अपनी सभा बुलाई.
विलुप्त होने के कगार पे पहुंचे इस पशुकुलश्रेष्ठ प्रजाति ने अपने विदर्भ समिति के अध्यक्ष से आग्रह किया कि वे दो शब्द कहें.

महाशय ने अपनी मजबूत कही  जाने वाली गर्दन को हिलाते हुए दुलत्ती मारने की प्रैक्टिस की और अश्रुमिश्रित शब्दों की वर्षा प्रारंभ की-
" साजिश है ये इंसानों की. अच्छे भले हम जंगल और बस्ती के बीच वाले स्थान में विचरण करते थे, कच्छ के रण में शोभित होते थे, मुफ्त में घास-पानी का लालच देकर इंसानों ने हमें गुलाम बनाया. हम तो ठहरे गधे, खुद तो गुलाम हुए ही, अपनी पूरी बिरादरी और फिर पूरी पीढ़ी को ही गुलाम बनवा दिया. "

मण्डली में बैठे एक जवान गधे ने नेता के पश्चाताप पर आश्चर्य जताया, उसे तो पता भी नहीं था कि गधे कभी आज़ाद जानवर भी हुआ करते थे, उसने तो धोबी के कोड़े खाने और बोझ ढोने को ही अपनी नियति मान ली थी.

अध्यक्ष रूपी वृद्ध ने अपने इतिहास की गलतियों को जगजाहिर करना जारी रखा-
" हमने अपनी गलतियों से कुछ नहीं सीखा. खुद गुलाम हुए, पूरी जाती को गुलाम बनाया, जो आज़ाद बचे थे उनके शिकार करने में अपने मालिक की मदद भी की. मगर इंसानों से बड़ा स्वार्थी इस दुनिया में कोई नहीं. जल्लाद इंसानों को हमारी आज़ादी ख़त्म कर के सुकून नहीं मिला तो हमारी वंशावली को भी चपेट में ले लिया. "

"वो कैसे!" एक बालक गधे ने नींद तोड़ते हुए फेसबुक अपडेट किया.

नयी पीढ़ी की भागीदारी से आंशिक ख़ुशी हासिल करते हुए नेता ने उसकी तरफ देखते हुए जेनोसाइड का रहस्योद्घाटन करना प्रारंभ किया-
"वंशवृद्धि के लिए पहले हमारे मालिक हमें खुले मैदान में छोड़ देते थे जहाँ स्वच्छंद वातावरण में हमारी सुंदरियां स्वयंवर का आयोजन करती थी, प्यार-मुहब्बत के माहौल में हम संसर्ग सुख को प्राप्त करते थे. हां, जंगलों की तरह अपने संतान की देखभाल का सौभाग्य तो हमें नहीं मिलता था, मगर हमारी गधियों पे सिर्फ हम गधो का हक था."
"तो क्या अब हमारी गधियों पे किसी और का हक हो गया?" ड्यूड एटीच्युड वाले लोफर नवजवान गधे की नींद खुली.

नेता अब अपने सर्वनाश की गाथा खुद कहने में असमर्थ हो रहा था, उसने महिला(गधी) मुक्ति मोर्चा की अध्यक्षा से आग्रह किया और खुद वहीँ पे लोट गया.
अत्यधिक प्रजनन पीड़ा से गुजरने के बाद एकदम काल के द्वार पे खड़ी मोहतरमा ने पश्चाताप को सार्वजनिक किया-
"उस दिन भी हम सज संवर कर स्वयंवर के लिए रवाना हो रहे थे, मगर राश्ते में एक जगह मुलायम घासों के ढेर ने हमें मोहित कर लिया. हम नरो के झुण्ड से अलग हो गए. मगर वह हमारी पीढ़ी के लिए युगांतकारी गलती थी. दरअसल वो घासों का ढेर हमारे लिए नहीं बल्कि पश्चिम से आये रेगिस्तानी इंसानों के काफिलों में शामिल घोड़ों के लिए था. महीनो से घर से दूर रहे घोड़े अपनी घोड़ियों के विरह में दुखी थे. मगर क्या पर्सनालिटी थी उनकी, गले के पास सुन्दर बाल, लम्बी संवरी हुई पूंछ, मदमस्त करने वाली चाल. हम में से एक गधी का दिल फिसल गया."

महोदया की इन  बात से जल भुन कर राख होते बुजुर्ग गधों ने अपनी कद काठी का मजाक बनना बर्दाश्त करते हुए शान्ति बनाये रखने में सहयोग किया.
"रेगिस्तानी कबिले के मुसाफिर वहीँ के गावं की एक औरत को उठा कर ले आये थे, वे उनके साथ जबरदस्ती करने लगे. हमें भाग जाना चाहिए था मगर हम अभी भी घोड़ो के रूप-अदा पर मोहित थे, होश ही नहीं रहा कि कब कुछ विदेशी घोड़ों ने अपनी हवस का निशाना हमें बना लिया है."

क्रोधित मगर मजबूर सेनापति की भूमिका वाले लंगड़े गधे ने उठकर कहा-
"हम तो वापस आये थे तुमलोगों को बचाने, मगर कुछ गधियो को प्यार हो गया था घोड़ो से. जब घर में ही विभीषण हो तो हार तो होनी ही थी. मेरे बड़े भाई को वीर गति की प्राप्ति हुई. मैंने अपनी टांग गंवाई. कुछ गधियों का अपहरण हो गया , वे रेगिस्तान चली गई. मगर हम कुछ गधियों को बचा कर लाने में कामयाब रहे."

मूर्ख जनता उसकी विजयगाथा पे वाहवाह करने लगी तो क्रोधित अध्यक्ष उठ खड़ा हुआ!
"बात इतने पे ख़त्म होती तो कोई बात नहीं थी. उस वर्ष स्वयंवर का कार्यक्रम रद्द हो गया. मगर कुछ गधियाँ गर्भवती हो गईं. हमने गर्भपात के आप्शन पर विचार किया मगर दयाभिभूत होकर एक और बड़ी गलती कर दी. उन्होंने बच्चो को जन्म दिया. बच्चे हृष्टपुष्ट थे. प्रसव पीड़ा बहुत ज्यादा हुई. मादा की सेवा में वे नर(गधे) लगे थे जिनका हक मरा गया था, जिनके घर की इज्ज़त लुटी गयी थी, सहिष्णुता की पराकाष्ठा पर थे हम. मगर हाय! ये बच्चे मंदबुद्धि निकले. देखने में लुभावने थे जरुर, कुछ चितकबरे भी थे. कद काठी में हमसे ऊँचे भी, मगर पेट से लालची. जहां घास दिखे वहीँ घिसक जाते, समाज की कोई चिंता नहीं. सबसे ख़राब कि उन्हें हमउम्र गधियों में कोई इंटरेस्ट नहीं था. और शीघ्र ही हमें पता चला कि ये सब के सब नपुंसक थे. "
आश्चर्यचकित जनता आँखे फाड़ सुन रही थी.

एक मॉडर्न गधी ने सवाल दागा-"मगर पीढ़ी आगे कैसे बढ़ी?आपकी कहानी में पूर्वाग्रह के भाव हैं, झूठ बोलते हैं आप , कम्युनल बना रहे हैं हमें!"
अपनी भावी पीढ़ी के मूर्ख विचारों से घायल अध्यक्ष ने उसकी जिज्ञासा शांत की-
"नपुंसक पीढ़ी ने हमें क्षणिक ख़ुशी दी. चलो बलात्कारियों की पीढ़ी आगे नहीं बढ़ेगी. हम पुनः जीन की शुद्धता को जारी रख पायेंगे. मगर इंसानों ने हमें फिर से धोखा दिया."
"फिर कैसे?क्या उन्होंने हमें मारना शुरू कर दिया क्योंकि हम अपवित्र हो गए थे?" अत्यधिक धार्मिक गधी ने घूँघट हटा कर पूछा.
"मार देते तो अच्छा था, कम से कम ये दिन तो नही देखना पड़ता." सेनापति ने घुटन महसूस करते हुए कहा.
अध्यक्षा ने आगे की कमान को सम्हाला-
"हमारे पुरुष विरादरी ने नपुंसक गधो के साथ इतना भेदभाव किया कि वे इंसानों के परमभक्त हो गए. इंसानों को शीघ्र ही ज्ञान हो गया था कि ये नपुंसक गधे शरीर से मजबूत मगर दिमाग के पैदल हैं, यानी बोझा ढोने के उस्ताद बिना किसी शिकायत के. इंसानों ने इन्हें खच्चर का नाम दिया. और तब से हर साल स्वयंवर के ठीक पहले हमारी आधी सुन्दरियों को इनसान उठा कर ले जाते हैं और हवसी घोड़ो के हवाले कर देते हैं. बची खुची, छंटी -कटी रिजेक्टेड आइटम्स से ही हम गधो का काम चलता है. इस क्रम में हम अच्छे ब्रीड को जन्म नहीं दे पाते. आधे नर गधों को तो ऐसे ही चांस नही मिलता तो वे समलैंगिक हो गए हैं. अब  नर गधो से इंसानों को कोई फायदा नहीं, उन्हें तो बस सुन्दर गधियाँ चाहिए और चाहिए खच्चर. और इस प्रकार से हम संख्या में हर साल कम होते चले गए. आज देश में गिनती के 689 गधे बचे हैं."
"तो क्या हम रेड डाटा बुक में शामिल हो गए, विलुप्तप्राय प्राणियों की लिस्ट में ?" जीनियस बच्चे ने इसमें भी अपनी गौरव गाथा खोजने की कोशिश की.
"हमारी किस्मत में प्रसिद्धि के साथ मौत भी नहीं लिखी हुई है. हम कौन से डायनासोर हैं जो हम पे कोई फिल्म बने और हम फेमस हों. ना ही हम शेरो की तरह आकर्षक खूंखार हैं जिन्हें आदमी अपनी जीत की निशानी के लिए जिन्दा रखे. हम तो लालची सीधे सादे मेहनती जानवर ठहरे जो अपनी निशानी भी दूसरो की दया पर जिन्दा रख पाए हैं."
"तो क्या किसी धार्मिक अनुष्ठान में भी हमारा कोई जिक्र नहीं है?" खोजी पत्रकार गधे ने अपनी ही बिरादरी पे वार कर के नाम कमाने की कला का परिचय दिया.
"अच्छा हुआ जो धर्म से विमुख हुए. वरना बीच सड़क पे काट दिए जाते! गायों का हाल देखा है तुमने?" अभी अभी शहर से लौटे खच्चर का भेष धारे पूंसक गधे ने अपनी ताजा खबर पेश की. धर्म में सम्मिलित नहीं होने के दाग पे भी सबने राहत की साँस ली. इसे कहते हैं आशावादी सोच. घोर आशावादी!

"मगर जेनोसाइड की प्रक्रिया अभी जारी है. अब घोड़ों को भी कोई नहीं पूछता सिवाय सेना के परेड के और जुए वाली घुडदौड के. खच्चर भी दिमाग से पैदल होने के कारण मालवाहक के अलावा किसी और काम में अपनी उपयोगिता नहीं साबित कर पाए. अब तो रेगिस्तानी तेल से चलने वाली पहिये वाली गाडी भी आ गयी है, इंसानों ने काफी तरक्की कर ली है. पहाड़ चढ़ने के लिए भी उड़ने वाली गाड़ियाँ हैं उनके पास." शहर से लौटा मुखबिर खच्चर का भेषधारी गधा बता रहा था.
" तो अब हम भी उड़ने वाली गाड़ियों में लादे जायेंगे?" मासूम बच्चे ने कल्पना लोक में खोते हुए अपनी माँ से पूछा.
"उसमे सिर्फ कुत्तो को चढ़ने की इज़ाज़त है. वे जानते हैं कि कब दुम हिलाना है और कब भौंकना है. स्वाभिमानी और मूर्ख जानवरों को ये सब नसीब नहीं.
तो भाइयों और घोड़ों की हो चुकी गधियों! हम अपने सर्वनाश के करीब हैं. क्या कोई उपाय है आपके पास कि हम अपनी स्पीशीज को धरती से गायब होने से बचा लें?" अध्यक्ष ने उम्मीद की थी कि कोई जोशीला जवान आगे आएगा और ये जिम्मेदारी लेगा.
मगर तभी बगल से घुड़सवार का एक काफिला गुजरा. आधी गधियाँ लाइनखोरी करती हुई उनके पीछे चल उठी. आत्महत्या के लिए जा रहे एक किसान ने अपनी अर्थी का सामान एक गधे की पीठ पे बांधना शुरू किया. बोझ के डर  से बाकी गधे मीटिंग को बीच में ही छोड़ रफूचक्कर हो गए.
लंगड़े सेनापति, बूढ़े नेता और मरणासन्न महोदया जीवन के आखिरी पड़ाव में ज्ञान प्राप्ति के अवसाद से और दुखी होकर पागलखाने की तरफ चलने लगे जहाँ शायद मुफ्त में कुछ घास-फूस मिल जाए.




Saturday, February 25, 2017

माँ शारदे

बुद्धि दे विवेक दे
ज्ञान मान तेज़ दे।
तमस को प्रकाश दे
स्वप्न को आकाश दे।
विचार को उत्थान दे
संकल्प एक महान दे।
अहंकार को उतार दे
कीर्ति को प्रसार दे।
माँ शारदे! माँ शारदे!


(बसंत पंचमी 2017 )

Sunday, November 6, 2016

पटाखे और प्रदुषण :बागोमेंबहारहै?

पटाखे और प्रदुषण : संभव है अगले कुछ दिनों में यह टॉपिक स्कूलों में निबंध का विषय बन जाये. जाहिर सी बात है लोगो के नजरिये अलग अलग होंगे और फिर उनके बच्चो के नजरिये भी उसी तरह के होंगे. कुछ कान्वेंट और मदरसे वाले स्कूलों में टॉपिक जरा बदला सा होगा- 'दिवाली और प्रदुषण'. वहीँ कुछ संघी स्कूलों में 'दिवाली और पटाखे' सरीखे टॉपिक पे वाद-विवाद के आयोजन भी होंगे जिसमे कुछ पक्षधर होंगे तो कुछ रविश कुमार के फोलोवेर्स.
अभी अभी दिल्ली से लौटा हूँ. और इस सच को अच्छी तरह से महसूस कर के आया हूँ कि वाकई दिवाली की रात लोगों ने हवाओं में खूब जहर घोला है. इतना जहर कि उस रात के बाद से दिल्ली की फिजाओं में बस धुआं और अँधेरा बिखरा है. जाने कैसी रौशनी फैला रहे थे लोग. प्रकाश पर्व में कब 'धुआं और ध्वनि' सम्मिलित हो गए यह तो इतिहासकारों के शोध का प्रश्न है- अलग बात है इतिहासकारों की भी आजकल जमात होती है,कुछ कम्मुनिस्ट तो कुछ सेक्युलर और कुछ देशभक्त.
खैर सिर्फ सवाल उठाना मेरा मकसद नहीं है, सिर्फ सवाल करने के लिए तो कई सारे लोग आपके इर्द गिर्द हैं. जिनका काम हर एक सेकंड सिर्फ सवाल करना है. और सवाल न मिले तो यह भी एक सवाल बन जाता है. और फिर आता है- #बागोमेंबहारहै?
आइये न हम इन सवालों के जवाब ढूंढे? हां! अगर आप सच में बागो और बहारो के शौकीन हैं, तो आइये न दो कदम चलते हैं साथ साथ...जवाब तलाशने के लिए.
१.    #पटाखे: हमें इनकी क्या जरुरत है? बेमतलब अचानक से चिल्ला देने वाले, गम हो या ख़ुशी- बस एक ही तरह के आवाज़ निकलने वाले ये क्या हैं? ख़ुशी तो हमारे नज़रिए में होती है. हमारे इतिहासों में तो धमाकों का जिक्र बस युद्ध-कथाओं में मिलता है. ख़ुशी के आयोजनों को मिनी-युद्ध की शक्ल देनेवाले, हादसों को आमंत्रित करने वाले, मेरे जैसे कमजोर-दिल वालों को डरपोक साबित कर हंसी का पात्र बना देने वाले, किसानो के इस देश में पुवालो-खलिहानों में चिंगारी देकर सब बर्बाद कर देने वाले,हवाओं में जहर घोलने वाले, बाल-श्रमिकों के सबसे लम्बी फौज खड़ी  करने वाले, प्रदुषण जैसे शब्द को हज़ार गुना महिमामंडित करने वाले, भारत-पाक क्रिकेट में देशभक्ति और देशद्रोह वाले मोहल्ले का पैमाना बनने वाले, न्यू-इयर में चाइना और लन्दन से तथा क्रिसमस में रोम से आतिशबाजी-कलाबाजी की तरह लाइव होनेवाले ये!!पटाखे क्या हमारे लिए इतना जरुरी हैं?
 क्यों न सरकार और समाज के द्वारा पटाखों और इसी की तरह बेमतलब के शोर करने वालो और ध्वनि-धुआं-ध्यान-और हमारी सोच को प्रदूषित करने वाली हर चीज़ पे बैन लगा दिया जाए. जैसे कि कुछ राज्यों में शराब पे बंदी है, क्यों न पुरे देश में पटाखों पे ही पाबन्दी हो. #पटाखोंपेपाबन्दी
२. #स्मोकिंग: दिवाली और प्रदुषण में फिलोसोफी झाड़ते लोगो को सुना. दिल्ली में ही सुना. चाय पे चर्चा करते देश के होनहारो को भी सुना और उनके  सामाजिक सरोकारों को भी. मगर ये मोदी वाली चाय पे चर्चा नहीं थी. ये थी #चाय सुट्टे पे चर्चा . जितना प्रदुषण ये पटाखे से कम करना चाह रहे थे, इनकी चर्चा लम्बी होती जा रही थी और उतनी ही बढती जा रही थी सुट्टे/सीगेरेट के खपत. यकीं मानिये दस मिनट में माहौल ऐसा कि मुझे मास्क लगाना पड़ गया. और मेरी सवाल पूछने के लिए ही सही मगर आवाज़ निकालने की हिम्मत नहीं हुई. अस्थमा ने भी मौका देखकर अपना अनशन तोड़ लिया था.
३.#ट्रैफिक: वो अमीरी ही क्या जो दुनिया को ना दिखे. दिल्ली में मर्सिडीज़, पोर्स्च, स्कोडा, bmw और भी कई तरह के ब्रांड ....सब रोड में चहलकदमी करते हैं...मगर उनमे सवारी सिर्फ एक. बाकी की सीट खाली. बाइक से ज्यादा कार यही पे दीखते हैं. हमारे रांची में तो यह अनुपात उल्टा है. मतलब सिर्फ शौक और दिखावे के लिए अपने पिछवाड़े से लगातार हवाओं में धुआं छोड़ने वाली ये आदत क्यों? क्या मेट्रो-बस-पब्लिक ट्रांसपोर्ट और साइकिल जैसे option पे विचार नहीं होना  चाहिए. सोचिये?

४. बाकी की सवालों को लिखने का एक ही मतलब है की आप बिना पढ़े उसे या तो like करेंगे या discard. अतः अपने शब्द बर्बाद कर के वैचारिक प्रदुषण फैलाने के मेरा कोई इरादा नहीं है. एक और आग्रह है उनलोगों से जो फेसबुक पे एक बार में 20-25 photo अपलोड करते है, जिनमे एक ही photo के तीन-चार नमूने होते हैं. तो जनाब इन तस्वीरों को कोई नहीं देखता, क्योंकि ना तो किसी के पास बेकार समय है ,ना ही डाटा....यह बल्क-अपलोड भी एक तरह का प्रदुषण ही है.#photopollution, #डाटाpollution.