Tuesday, July 14, 2015

रिम्स ग्राउंड फ्लोर के दोनों छोर





जी हाँ रिम्स के ग्राउंड फ्लोर के दोनों छोर एक दुसरे के पूरक हैं. एक छोर पे चोरों का डेरा और दुसरे छोर पे पहरेदारों का बसेरा.

 एक छोर पे है तथाकथित डेंगू वार्ड - जिसमे इलाज़ करवाते हैं आर्मी/पुलिस/ बटालियन के जवान . कुछ तो सच में बीमार होते हैं जो झारखण्ड के एंडेमिक मलेरिअल अटैक की चपेट में आ जाते हैं. और कुछ जो ऑपरेशन/अभियान में जाने से डरते हैं, किसी न किसी बहाने से यहाँ आकर भरती हो जाते हैं. एक जूनियर डॉक्टर का कहना था- " यार! ये लोग देश के लिए इतना कुछ करते हैं तो जरा सा आराम कर ही लिया तो क्या गुनाह किया.  बड़े बड़े अफसर,मंत्री और कभी कभी हम डॉक्टर भी, सब इतने घोटाले करते हैं, ये बेचारे अपने परिवार के साथ समय बिताने के बहाने इतनी सी नौटंकी  कर ही लें तो कौन सी बड़ी बात हो गयी."

और उसी ओर्थो फ्लोर के दुसरे छोर पे स्थित है- कैदी वार्ड. डेंगू वार्ड से एकदम विपरीत. यहाँ जेल से कैदी भेज दिए जाते हैं बेहतर इलाज़ के लिए और  साथ में जेल से दो कांस्टेबल भी. इनका इलाज़ एकदम मुफ्त होता है. हर विभाग में कंसल्टेंट ही इन्हें देखते हैं. आम मरीजों को भले अल्ट्रासाउंड का नंबर एक सप्ताह  बाद का मिले, इन्हें अगले दिन का ही नंबर मिलता है . और कुछ दिनों के अन्दर ही इनके फाइल की मोटाई उसी गति से बढ़ जाती है जिस गति से मेडिसिन पीजी के बाल उड़ते हैं.

रिम्स में इलाज़ के लिए दो तरह के कैदी आते हैं.तो आइये अब मैं  रिम्स आने वाले कैदियों के दो टाइप्स के बारे में अपनी फिलोसोफी झाड़ू.
एक टाइप वो जो सच में बीमार होते हैं. जैसे कि - दोनों किडनी ख़राब हो चूका वो बूढा  बाबा जो डायलिसिस कराने रिम्स आया था, और जिसे  उसके घरवाले लगभग भूल चुके थे. उसके मरने के एक दिन पहले उसका भाई  बस फॉर्मेलिटी  के लिए  आया था और बहाने बनाता हुआ भाग गया था. या फिर वो खतरनाक रेपिस्ट -मर्डरर जो अपने समय में दबंग पहलवान खूंखार गुंडा हुआ करता था. मगर जेल की चारदीवारियों के अन्दर टीबी की चपेट में आकर इस हाल में पहुँच गया था कि उसके मल-मूत्र भी उससे दगाबाजी करते हुए  उसकी मर्ज़ी के खिलाफ बाहर निकल पड़ते थे. और वो अस्थमा वाला चाचा जो दिन रात बस जेल वापस भेजने की जिद करता रहता था. मोतियाबिंद ने उसकी रौशनी भी छीन ली थी. उससे मैं पूछ ही बैठा था एक दिन- " बाबा दिखता  तो तुम्हे कुछ है नहीं, जेल में रहो या रिम्स में, क्या फर्क पड़ता है? यहाँ कम से कम दवाई खाना वगैरह तो समय पे मिलता रहेगा. जेल में  शादी वादी कर  रखी  है क्या जो लौटने की जल्दी मची है?" मैंने तो बस दिल्लगी में पूछा था लेकिन शादी वाली बात पे वो भावुक हो गया था. भीगी अंधी आँखों को छुपाते हुए कहने लगा-" बाबू, इलाज़ तो हो गया, अब जेल वापस भेज दो. वहां का आंगन-चबूतरा-बाथरूम -बिस्तर सब की दुरी मुझ से नापी हुई है. हर आवाज़ जानी पहचानी लगती है. सबसे बूढा कैदी हूँ मैं अपने जेल का, जेलर हो या बाकी कैदी सब मुझे इज्ज़त देते हैं .और फिर जिंदगी के २० साल तो उसी जेल में बीते हैं तो वही ठिकाना न अपना अपना लगेगा.यहाँ तो जरा सा हाथ पसरता हूँ तो दिवार से टकरा जाता हूँ." बाद में मालूम चला कि शादी के दुसरे सप्ताह  ही उसकी बीवी किसी हादसे से जल कर चल बसी , मगर उसके भाई ने दहेज़-हत्या के कानून में उसे उलझाकर उसकी जमीन हड़प ली.  खैर ऐसे कितने ही कैदी आते जाते रहते हैं रिम्स में , सबकी अलग अलग कहानी होती है. हर कैदी मेरे मन में कई सवाल पैदा कर के जाता है.....
"इतने खतरनाक अपराध करने वाले दरिंदो का इलाज़!! क्या इन्हें तड़प कर मरने नहीं देना चाहिए जेल में ही?"
"कौन जानता है कि वे सच में अपराधी हैं भी या कानून के सताए हुए आम इंसान हैं. और फिर मेरा फ़र्ज़  मुझे इस तरह दो इंसानों में फर्क करने की इज़ाज़त तो नहीं देता!"
" मगर फिर भी, उन्हें उनके किये की सजा तो मिलनी ही चाहिए. क्या जेल मात्र ही उनके अपराध के लिए काफी है? या फिर उपरवाला उन्हें उनके दुष्कर्मो के आधार पे जेल के अलावा बीमारियों के रूप में अपनी सजा दे रहा है?"
" या फिर दबंग टाइप के कैदी जेल में भी ऐशो आराम के साधन जुटाने में कामयाब हो जाते हैं मगर बाकि के लोग जेलर की नज़र-अन्दाज्गी और दबंगों की दबंगई के बीच में पीस कर बीमार बना दिए जाते हैं?"
" और ये मानवाधिकार आयोग! हर दिन कितने ही गरीब  सौ-दो सौ रुपये के अभाव में रिम्स पहुँचने से पहले ही या रिम्स में दम तोड़ देते हैं, कोई मानवाधिकार नहीं। मगर कोई भी कैदी जो मर जाए, ये लम्बी लाबी चिट्ठी पतरी"

खैर एक  दुसरे टाइप के कैदी भी हैं रिम्स में - कॉटेज वाले!!!!
इनकी बिमारी पकड़ना एक आम आदमी के लिए जितना आसान है एक डॉक्टर के लिए उतना ही मुश्किल. क्योकि आम आदमी किसी भी शख्स में  उसके फिटनेस को ढूंढता है, मगर हम डॉक्टर किसी भी इंसान में छुपे  इलनेस यानि बिमारी को ढूंढते हैं. नज़रिए का फर्क है. नॉन-मेडिको आसानी से किसी को भी ठीक-ठाक डेक्लेअर कर देते हैं और हम उतने ही नाप-तौल और उहा-पोह में फंसे हुए. सही में हमारे लिए बिमारी ढूंढना आसान है मगर फिटनेस को ढूँढना उतना ही मुश्किल. और इसी का फायदा उठाते है ये कॉटेज वाले कैदी.
अब इन कॉटेज वाले कैदियों के बारे में  शब्द बर्बाद करने का मन नहीं कर रहा- लेकिन इतना ही समझ लीजिये कि ये लोग हमारे लिए सांप -छुछुंदर वाली स्थिति पैदा करते रहते हैं. और इनके चक्कर में नुक्सान किसका होता है- गरीब जनता का ही न .
इस बात पे फिर कभी भड़ास निकलेगी.
इवनिंग राउंड का टाइम हो गया है, भागता हूँ आज एक असली वाले कैदी -मरीज़ के लिए अपने पुराने शर्ट ले कर जा रहा हूँ, बेचारा एक सप्ताह से एक ही कपडे में सिमटा है.

अरे हाँ मैं एक बात तो बताना भूल ही गया.  रिम्स ग्राउंड फ्लोर के दोनों छोर के बीच में भी कुछ है. एक अलग सी इंसानियत को शर्मशार करती हकीकत. लावारिश अधमरे ज़िंदा लाशों की बस्ती. ये जिंदगी की सुबह से दूर घिसट घिसटकर हर पल मौत की गोदनुमा शाम की तरफ ढल रहे हैं. और तरस खाती  आम जनता द्वारा फेंकी गयी हर एक भीख उन्हें जिंदगी के तरफ लौटने की झूठी उम्मीद देती है मगर सांसो की थकती सी रफ़्तार जल्द ही उन्हें सच्चाई की तरफ मुह मोड़ने को  विवश कर देती है.