Sunday, September 17, 2017

ल प्रे क 08 : ईमेल

“मैं दो दिन के लिए मुंबई आ रहा हूँ. अगर तुम ये ईमेल पढ़ रही हो तो रिप्लाई करना.”

वाह! 4 साल बाद याद आई जनाब को. मगर इन 4 सालों में तो कितना कुछ बदल गया था. छूट गया था उसका छोटा शहर. पीछे रह गयी थी उसकी कॉलेज की यादें और समीर की कविताओं की महफ़िल. तब उसकी सहेलियां चिढाती थी अन्ताक्षरी के हर रोमांटिक गाने पर. हया और गुदगुदी के बीच उसे निहारती समीर की निगाहों की अलग ही सी दुनिया होती थी.

पुरे पैराग्राफ वाले मेसेज में जो भाव उभर कर आते हैं, वो शॉर्टकट वाले वर्ड्स में कहाँ. उसने टाइप करना जारी रखा. याद आया वो पल जब समीर ने कैफ़े में साथ बैठ ईमेल ID बना दिया था. ID बनाने में माथा पच्ची इतनी जैसे बच्चे का नाम रखना हो. जब समीर ने उसे प्रोपोज किया, धड़कन को बेतहाशा भागते हुए महसूस किया था उसने. मगर इस पल की तैयारी तो जाने कब से किये जा रही थी वो. खुद पे कण्ट्रोल रख बेरुखी दिखाना और ये सोचते हुए बढ़ जाना- “कल तो पक्का एक्सेप्ट कर लुंगी मगर आज रात इस शायर को तड़पना होगा.”
मगर घर आते ही अब्बू का फरमान- ‘‘बेटे आपकी शादी तय हो गयी है. कल से कॉलेज बंद.”

“मुझे समीर को रिप्लाई करना चाहिए? शादी शुदा हूँ अब!”

मगर कितनी अकेली थी वह यहाँ? चार सालों में काम वाली बाई और अपार्टमेंट गार्ड की बूढी माँ के अलावा किसी और से जुड़ भी नहीं पायी. हस्बैंड भी दिन भर ऑफिस और घर आते ही न्यूज़ चैनल में बिजी. ऊपर से बात बात में टोकना- “गंवारों की तरह कार की सीट पे पालथी मारकर मत बैठो! उफ़ ऐसे पकड़ो कांटे चम्मच!...यहाँ पार्लर में लड़के ही बाल काटेंगे...!” आजतक ठीक से बैठ कर बात तक नहीं की थी दोनों ने.

“मगर एक दोस्त के नाते तो ....पर वो सिर्फ दोस्त तो नहीं? मैं भी तो पसंद करती थी न उसे! लेकिन एक बार बात करने में क्या हर्ज़ है? फिर ये सिलसिला ना थमा तो?” वह आईने में खुद की आँखों में झांककर जवाब ढूंढ ही रही थी कि नीचे से कार की आवाज़ आई. कलेजा धक् से किया उसका और एक ही झटके में उसने मेल डिलीट कर दिया. और उसने डिलीट कर दिया था समीर का कांटेक्ट भी.

हाथ में पानी का गिलास थामे, guilt के साथ नज़रें झुकाए दरवाजे के पास खड़ी हुई थी कि पति ने इशारा करते हुए कहा-

“मीट माई न्यू वाइफ. आज से यहीं रहेगी”

#shortLoveStory #लघुप्रेमकथा

Ⓒ Govind Madhaw

Tuesday, September 5, 2017

ल. प्रे. क 07: पिछली सीट की सवारी


तुम्हे याद है जब हम बाइक से शहर का चक्कर काट रहे थे, हलकी बारिश का लुत्फ़ लेते हुए. बहुत लगाव था ना तुम्हे इस शहर से. अक्सर अनजानी गलियों में यादों को तलाशते हुए घुस जाया करते थे तुम, अपने भीतर के कोलम्बस को ढूंढते हुए. अजनबी फूटपाथ वाले से कुछ खरीदना तो एक बहाना होता था, तुम्हे तो उसकी चादर नुमा बिखरी दूकान के पीछे की जिंदगी में ज्यादा दिलचस्पी होती थी. कई बार मैं irritate भी हो जाती थी- “ये पागलपन वाले काम अकेले में किया करो. हर बार मुझे साथ घसीटने की क्या जरुरत?”
और तुम्हारा वही जवाब- “मैं क्या हूँ यह मैं बता नहीं सकता. बस मुझमें से होकर गुजरने का मौका दे सकता हूँ.”

शहर के पुरबी छोर में चौराहे के बगल में बैठी वो सब्जी बेचने वाली बुढ़िया याद है? चाय की चुस्कियों के साथ उसे ऑब्जर्व करते हुए बोल रहे थे तुम – “इसके घर में दो से अधिक आदमी नहीं होंगे, क्योंकि इतनी सब्जियां बेचकर ही इसके चेहरे पे संतुष्टि के भाव हैं. अब ग्राहक का इंतज़ार नहीं कर रही वो, इसने आज के लिए पर्याप्त सौदा कर लिया है. इसकी नज़रों में देखो. ये सड़क के उस छोर की तरफ देख रही है बार-बार, जिधर से ग्राहक नहीं गाड़ियाँ आती हैं. तेज़ होती बारिश इसके माथे पे चिंता की लकीर खिंच रहे हैं जबकि इसकी दुकान ऊँचे जगह पे एकदम शेड में है, यानि कोई आ रहा है जिसके भीग जाने का डर है. मंदिर में आरती शुरू होते ही उसने अपनी गठरी समेटना शुरू कर दिया, यानि अब उसके आने का समय हो गया है. वो देखो पोटली में पैसे किस तरह बांध रही है, मगर आँचल में नहीं बांध रही, शायद किसी को सौंप देगी अपनी कमाई. मगर जिस लगन से पोटली लपेट रही है, किसी अपने को ही देने वाली है, जो इसके दिल के बेहद करीब है, वरना दुसरे को अपनी कमाई देते समय अमूमन लोगों में थोड़ी हिचकिचाहट होती है.....”
अब बस भी करो मेरे शर्लाक! मैंने टोक दिया था तुम्हे.
फिर हमने जाते हुए देखा था उन दोनों को- सब्जी वाली बुढ़िया और उसके रिक्शाचालक प्रेमी को. वह प्रेमी अपनी प्रेमिका को रिक्शा की सवारी करते हुए वैसा ही महसूस कर रहा था जैसा तुम अपनी नयी नयी बाइक में मुझे बैठा कर. जैसे दुनिया की सबसे खुबसूरत लड़की तुम्हारे साथ है. लोगों के बीच में रफ़्तार धीमी कर उन्हें जाताना कि तुम्हारे पास भी.....और फिर बयार के संग किसी नगमे को होठों पे थिरकाते हुए, मेरी तरफ मुस्कुराती निगाहों का फेरना. मैं शरारती लहजे में कहती कि आगे देख लो किसी को चोट ना लग जाए.
लेकिन जो तुम कभी नहीं देख पाए कि आखिर उस बुढ़िया के मन में क्या भाव थे? ठीक वैसे ही जैसे तुम कभी नहीं समझ सके कि तुम्हारे बाइक की पिछले सीट की लगभग परमानेंट सवारी बन कर मुझे कैसा लगता था.
आज मैं वहीं खड़ी थी. मेरे पति को सिगरेट खरीदना था.

ल. प्रे. क 06: data off


मैं गुस्सा जाती हूं जब भी तो मोबाइल का data off कर देती हूँ. ये सोच कर कि अब देखना ही नहीं मुझे तुम्हारे झूठे मैसेज और फॉरवर्ड किए हुए quotes. मगर मजबूर मैं खुद हूँ. कुछ देर बाद इस उम्मीद से data on करती हूं कि तुम्हारे मैसेज भरे हुए होंगे. मगर तुम नहीं समझ पाओगे.


#shortLoveStory #लघुप्रेमकथा #लप्रेक03